षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi)व्रत कथा: तिथि, महत्व, विधि और संपूर्ण पौराणिक कथा
षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) का परिचय
हमारे सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। इन्हीं एकादशियों में से षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi)को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। इस दिन तिल (तिलहन) का विशेष महत्व होता है, इसी कारण इसे षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) कहा जाता है। “षट” का अर्थ छह होता है, अर्थात इस दिन तिल का छह प्रकार से प्रयोग किया जाता है।
हम इस लेख में षटतिला एकादशी व्रत कथा, इसका धार्मिक महत्व, पूजा विधि, नियम, लाभ और पौराणिक कथा को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत कर रहे हैं।
षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) का धार्मिक महत्व
षटतिला एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत विशेष रूप से दरिद्रता, रोग, ग्रह दोष और पितृ दोष से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है।
शास्त्रों के अनुसार, इस एकादशी का व्रत करने से हजारों अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है। भगवान श्री विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) व्रत में तिल का महत्व
इस व्रत में तिल का विशेष स्थान है। शास्त्रों में तिल को पवित्र, शुद्ध और पाप नाशक माना गया है। इस दिन तिल का छह प्रकार से उपयोग किया जाता है:
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तिल का दान: गरीबों या ब्राह्मणों को तिल का दान करना।
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तिल से स्नान: तिल मिश्रित जल से स्नान करना।
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तिल का उबटन: शरीर पर तिल का उबटन (लेप) लगाना।
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तिल का हवन: तिल से हवन करना।
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तिल मिश्रित जल का पान: पितरों को तिल मिला हुआ जल अर्पित करना।
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तिल से बना भोजन ग्रहण करना : तिल से बने व्यंजन खाना।
इन छह कर्मों के कारण ही इसे षटतिला एकादशी कहा जाता है।
षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) व्रत कथा
पौराणिक कथा का वर्णन
पद्म पुराण के अनुसार, एक बार देवर्षि नारद ने भगवान श्रीकृष्ण से षटतिला एकादशी के महत्व और कथा के बारे में पूछा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने यह कथा सुनाई:
प्राचीन काल में पृथ्वी पर एक ब्राह्मणी रहती थी। वह भगवान विष्णु की परम भक्त थी। वह बड़ी श्रद्धा से व्रत और पूजा-पाठ करती थी। उसकी भक्ति इतनी गहरी थी कि वह कठोर से कठोर व्रत भी आसानी से कर लेती थी। लेकिन उसमें एक कमी थी—वह कभी भी किसी गरीब या जरूरतमंद को अन्न (अनाज) का दान नहीं करती थी। वह कपड़े और गहने तो दान करती थी, लेकिन भोजन का दान करने में उसे संकोच होता था।
भगवान विष्णु ने उसकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे एक गरीब भिक्षु का वेश धारण करके उसके पास पहुंचे और भिक्षा मांगी। ब्राह्मणी ने झुंझलाकर उन्हें भिक्षा देने से मना कर दिया। जब भगवान ने बार-बार आग्रह किया, तो उसने गुस्से में आकर एक मिट्टी का ढेला उठाकर उनके भिक्षापात्र में डाल दिया। भगवान वह मिट्टी लेकर मुस्कुराते हुए चले गए।
कुछ समय बाद, अपने पुण्य कर्मों और व्रतों के प्रभाव से ब्राह्मणी मृत्यु के बाद बैकुंठ लोक (स्वर्ग) पहुंची। वहां उसे रहने के लिए एक सुंदर और भव्य महल मिला। लेकिन जब उसने महल के अंदर देखा, तो वह हैरान रह गई। महल पूरी तरह खाली था—न वहां खाने के लिए अन्न था, न धन, और न ही कोई सामान।
दुखी होकर उसने भगवान विष्णु से प्रार्थना की, “हे प्रभु! मैंने जीवन भर आपकी भक्ति की और कठिन व्रत किए, फिर मुझे यह खाली महल क्यों मिला?”
भगवान विष्णु प्रकट हुए और बोले, “देवी, तुमने व्रत और तपस्या तो बहुत की, जिससे तुम्हें स्वर्ग और यह महल मिला। लेकिन तुमने कभी किसी भूखे को अन्न का दान नहीं किया। जब मैं भिक्षा मांगने आया, तो तुमने मुझे मिट्टी का ढेला दिया। इसलिए तुम्हें तुम्हारे कर्मों के अनुसार ही फल मिला है।”
ब्राह्मणी ने अपनी गलती मानी और इसका उपाय पूछा। भगवान ने कहा, “शीघ्र ही देवकन्याएं तुमसे मिलने आएंगी। तुम तब तक अपना द्वार मत खोलना जब तक वे तुम्हें षटतिला एकादशी के व्रत और विधि का वर्णन न कर दें।”
जब देवकन्याएं आईं, तो ब्राह्मणी ने वैसा ही किया। उन्होंने उसे षटतिला एकादशी का महत्व और तिल दान की महिमा बताई। ब्राह्मणी ने विधि-विधान से षटतिला एकादशी का व्रत रखा और तिल का दान किया। इसके प्रभाव से उसका महल धन-धान्य और भोजन से भर गया।
षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) व्रत की पूजा विधि

हम इस व्रत की सरल और शास्त्रसम्मत पूजा विधि प्रस्तुत कर रहे हैं:
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प्रातःकाल तिल मिश्रित जल से स्नान
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स्वच्छ वस्त्र धारण करें
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भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें
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तिल, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें
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“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें
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तिल से हवन करें
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दिनभर उपवास रखें
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रात्रि में षटतिला एकादशी व्रत कथा का पाठ करें
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अगले दिन द्वादशी को पारण करें
षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) व्रत के नियम
इस व्रत में कुछ विशेष नियमों का पालन आवश्यक है:
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क्रोध, झूठ और निंदा से बचें
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ब्रह्मचर्य का पालन करें
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तामसिक भोजन का त्याग करें
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गरीबों और ब्राह्मणों को तिल, वस्त्र और अन्न का दान करें
षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) व्रत के लाभ
षटतिला एकादशी व्रत करने से निम्न लाभ प्राप्त होते हैं:
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सभी पापों से मुक्ति
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आर्थिक संकट का नाश
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पितृ दोष से छुटकारा
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दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य
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मोक्ष की प्राप्ति
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भगवान विष्णु की विशेष कृपा
षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) और मोक्ष का संबंध
शास्त्रों में कहा गया है कि जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक षटतिला एकादशी व्रत करता है, वह वैकुंठ लोक को प्राप्त करता है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत फलदायी है जो जीवन में कष्ट, दरिद्रता और बाधाओं से जूझ रहे हैं।
निष्कर्ष
हम निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि षटतिला एकादशी व्रत कथा केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि यह धर्म, दान और भक्ति का संदेश देती है। तिल के माध्यम से किया गया यह व्रत हमें सिखाता है कि छोटी-सी श्रद्धा भी महान फल दे सकती है।
जो भी श्रद्धालु इस व्रत को विधिपूर्वक करता है, उसके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।